चीन और सीमा विवाद



पिछले 70-80 सालों में चीन की क्या नीति रही इससे कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। आए दिन अखबारों की सुर्खियां उसी के नाम होती हैं। चीन क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व का चौथा सबसे बड़ा देश है। उसकी सीमाएं बहुत से देशों से मिलती हैं , परंतु शायद ही ऐसा होगा कि किसी दिशा में किसी देश से उसका सीमा विवाद न चल रहा हो। 1962 में भारत से महीने भर युद्ध चला , 69 में रूस से और 79 में वियतनाम से लगभग 21 दिन युद्ध चलता रहा और हर बार युद्ध का कारण सीमा विवाद ही रहा है।


ताइवान पर चीन का लगभग पूरा कंट्रोल है। हांगकांग भी इससे अछूता नहीं रहा , अभी हाल ही में बने कानून से हांगकांग पूरी तरह चीन के गिरफ्त में है। तिब्बत पर तो कब से अधिकार किए बैठा है। अब कुछ रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि उसकी नज़र अफगानिस्तान पर भी है, आख़िर क्या चाहता है चीन?


मतलब साफ है , उसे अधिकार चाहिए। वैसे ही राष्ट्रवाद की आग पहले भड़की हुई थी उसपर कम्युनिस्ट (साम्यवादी) सरकार ने पेट्रोल डाल दिया। कम्युनिस्ट मतलब कंट्रोल। पूरे एशिया पर कंट्रोल ही उसका लक्ष्य है। और ऐसे में एशिया का दूसरा विकसित देश भारत ही उसके मार्ग का कांटा है।


यूरोप से जब राष्ट्रवाद की लहर उठी थी तो किसी भी विचारक ने ऐसा परिणाम नहीं सोचा होगा। वह तो एकता चाहते थे। प्रगति और समृद्धि की इच्छा रखते थे, परन्तु इस राष्ट्रवाद ने केवल विध्वंस ही दिया है तोहफे में। पहले दो-दो विश्वयुद्ध और फिर संसार के इतने सारे सीमा विवाद। ख़ासकर चीन पूरे विश्व के लिए गले की फांस बन गया है। "न उतारते बने न पहनते" चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और बहुत जल्द प्रथम स्थान पर भी काबिज हो जाएगा। दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार है चीन। दुनिया के सभी देशों से बड़े पैमाने पर सामान खरीदता है। ऐसे में कई देशों की अर्थव्यवस्था आंशिक तौर पर ही सही चीन पर निर्भर करती है और वो उसी का फायदा उठा रहा है।


बचपन में एक कहानी पढ़ी थी जिसमें एक चूहा बहुत उछलता कूदता है , ढूंढने पर मालूम होता है कि उसने बहुत सा अनाज जमा कर रखा है और जब लोगों ने वह अनाज वहां से हटा दिया तो वह चूहा भी शांत हो गया। यह कहानी अब व्यवहार में लानी पड़ेगी। अगर चीन से उसका बाज़ार छीन लिया जाए तो वह निर्बल हो जाएगा और विश्व शांति के लिए ये कदम अत्यावश्यक है। अन्यथा एशिया फिर से गुलामी के जंजीर में बांधा जाएगा और इस बार कोई यूरोपियन नहीं बल्कि एशियाई देश ही उसका कारण होगा।


इन विवादों की एक और नियति हो सकती है , एक और संभावना बनती है। एक अंदेशा जो लोमहर्षक है।

दुनिया भर में बढ़ते सीमा विवादों से इतना तो तय है कि तीसरा विश्वयुद्ध निकट ही है। परंतु देखना यह होगा कि क्या चीन की गति जर्मनी जैसी होती है? क्योंकि इससे पहले हिटलर का जर्मनी भी ऐसा ही छुट्टा सांड था। वह भी अनैतिक व अवैध विस्तार चाहता था। परिणाम हम सबके सामने है। क्या इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है? चीन की नियति क्या है?



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