"अभिव्यक्ति की आज़ादी" की आड़ में कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे हैं तथाकथित पत्रकार व लेखक


अजीब विडम्बना है - एक समय था जब लेखन एवं पत्रकारिता को बहुत ही गम्भीरता से लिया जाता था और कलम के मुहाने से पिरोए हुए हर शब्द व वाक्य में एक अजीब-सी ताक़त होती थी जो बड़ी से बड़ी व्यवस्था को हिलाने की कूबत रखता था। चाहे राजा हो या रंक, हर कोई एक लेखक और उसके लेखन-शैली के प्रति नतमस्तक रहता था। मान्यता है कि “एक कलम में वो ताक़त होती है जिसके सामने बड़े से बड़ा हथियार भी बौना हो जाता है।”


पर अब हाल और हालात दोनो ही बदल चुके हैं। कारण है, अब लेखन में रुचि होने से ज़्यादा प्रसिद्धि पाने की लालसा एवं चार लोगों के समक्ष वाहवाही बटोरने की महत्वकांक्षा। इस लालसा ने लोगों को कई आयाम दिए हैं, जैसे - कई पुरुष आजकल खुद को “लाली-लिप्स्टिक” लगा के, नारी के अस्तित्व को खुद में बसा के अजीबो-गरीब हरकत करते हुए “सोशल मीडिया ऐप्लिकेशन” पर पाए जाते हैं। ऐसे ही आज के युग में फ़ेम-गेम के लिए बहुत से वाहियात साधन मौजूद हैं।


ख़ैर, लेखन को इन बातों से जोड़ना खुद में लेखन का अपमान है परन्तु जिस तरह से आज के युवाओं ने लिखने की कला का मज़ाक़ बनाना शुरू किया है वह इससे कहीं कम भी प्रतीत नहीं होती है। अब तो बस जिसके पास साधन है वही लेखक है क्योंकि अभिव्यक्ति की आज़ादी तो सभी को है, पर कोई इन तथाकथित लेखकों से पूछे की क्या इन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी का असल मतलब पता है? क्या ये जानते हैं कि कौन सी बात किस प्रकार व्यक्ति या समाज तक पहुचानी चाहिए? क्या इन्हें लेखन की मर्यादा पता है?


ऐसे कई सवाल हैं, जिनमे अधिकांश का जवाब “ना” होगा, क्योंकि इस वर्ग को इन बातों से कोई सरोकार नहीं है - इनका मक़सद तो सिर्फ़ और सिर्फ़ मनमर्ज़ी करना और चलते जाना है। मेरे कहने का आशय बिल्कुल भी यह नहीं है कि लेखन एक ग़लत काम है, बल्कि अपने मन की बात को किसी भी माध्यम से दूसरों तक पहुँचाना एक बहुत ही कलात्मक प्रयोग है। पर ज़रूरत है आज के समय में लेखन की कला को समझने की, इसके गूढ़ मंत्र को समझने की, ताकि आपका लिखा हुआ एक-एक शब्द आपकी बातों को सही तरीक़े से व्यक्त कर सके ना कि आपके लिखने की क्षमता को हास्यास्पद परिस्थिति में ला कर खड़ा कर दे।


अगर कोई भी व्यक्ति खुद को लेखक के रूप में देखता है और वह इसके लिए गम्भीर है तो ज़रूरत है सही दिशा की, अध्ययन की। वर्ना इस चकाचौंध भरी दुनिया में, जहां अब अधिकांश लोग किसी भी लेख को पढ़ने से ज़्यादा “टेलिविज़न” या अन्य स्रोत से सुनना या देखना पसंद करते हैं, वहाँ लेखक के तौर पर आपकी छवि एक कुकुरमुत्ते से अधिक नहीं होगी। क्योंकि ऐसे लेख़क अब हर गली, मुहल्ले और चौराहे पे बिकते हैं।


खंडन: इस लेख का आशय किसी व्यक्ति-विशेष की भावनाओं का अपमान करना बिल्कुल नहीं है, बल्कि नए उभरते लेखकों का मनोबल बढाने की एक कोशिश-मात्र है।


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